🌟 UPTET 2026: पर्यावरण अध्ययन (EVS) अध्याय 5 - हमारा परिवेश, मेला एवं स्थानीय पेशे(विस्तृत नोट्स) 🌟
दोस्तों, SK SACHIN CLASSES के पर्यावरण अध्ययन (EVS) सीरीज़ में आपका एक बार फिर से स्वागत है।
आज हम EVS के तीन बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यावहारिक टॉपिक्स— 'हमारा परिवेश', 'मेला' और 'स्थानीय पेशे' का एक साथ अध्ययन करेंगे। हमारा परिवेश केवल पेड़-पौधों से नहीं बनता, बल्कि हमारे आस-पास रहने वाले लोगों, उनके कामों (पेशों) और हमारी संस्कृति (मेलों और त्योहारों) से मिलकर बनता है। UPTET की परीक्षा में मेलों के स्थान (विशेषकर यूपी के मेले) और पेशों से जुड़े औजारों पर सीधे प्रश्न आते हैं। आइए, इन्हें रट लेते हैं।
🔹 1. हमारा परिवेश (Our Surroundings)
'परिवेश' का अर्थ है हमारे आस-पास का वह वातावरण जिसमें हम रहते हैं।
हमारे परिवेश में मुख्य रूप से दो प्रकार के घटक (Components) पाए जाते हैं:
- जैविक घटक (Biotic Components): इसमें सभी जानदार (Living) चीज़ें आती हैं। जैसे- मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े और पेड़-पौधे।
- अजैविक घटक (Abiotic Components): इसमें सभी निर्जीव (Non-living) चीज़ें आती हैं। जैसे- हवा, पानी, मिट्टी, सूरज की रोशनी, पहाड़ और नदियां।
एक अच्छे और स्वस्थ परिवेश के लिए जैविक और अजैविक घटकों के बीच संतुलन (Balance) होना बहुत ज़रूरी है।
🔹 2. स्थानीय पेशे और व्यवसाय (Local Professions)
हमारे समाज में हर व्यक्ति की ज़रूरतें (जैसे- खाना, कपड़े, मकान, इलाज) कोई एक अकेला इंसान पूरी नहीं कर सकता। इसलिए, समाज में अलग-अलग लोग अलग-अलग काम करते हैं, जिन्हें 'स्थानीय पेशे' कहा जाता है।
UPTET के लिए महत्वपूर्ण पेशे और उनके औजार (Tools):
- किसान (Farmer): * यह हमारे समाज का 'अन्नदाता' है।
- प्रमुख औजार: हल (खेत जोतने के लिए), फावड़ा, खुरपी (निराई-गुड़ाई के लिए), हंसिया (फसल काटने के लिए) और ट्रैक्टर।
- लोहार (Blacksmith): * जो लोहे को गर्म करके उससे विभिन्न प्रकार के औजार (जैसे- कुल्हाड़ी, फावड़ा) बनाता है।
- प्रमुख औजार: निहाई (जिस पर लोहा रखकर पीटा जाता है), हथौड़ा, धौंकनी (आग तेज़ करने के लिए) और संड़सी (गर्म लोहा पकड़ने के लिए)।
- बढ़ई (Carpenter): * जो लकड़ी का सामान (कुर्सी, मेज़, दरवाज़े) बनाता है।
- प्रमुख औजार: आरी (लकड़ी काटने के लिए), रंदा (लकड़ी को चिकना करने के लिए), हथौड़ा और पेंच।
- कुम्हार (Potter): * जो चिकनी मिट्टी से बर्तन (घड़े, दीये, सुराही) बनाता है।
- प्रमुख औजार: चाक (पहिया जिस पर मिट्टी घूमती है), चाक घुमाने वाली डंडी और थापा (बर्तन को थपथपा कर आकार देने के लिए)।
- दर्जी (Tailor): * जो हमारे लिए कपड़े सिलता है।
- प्रमुख औजार: सिलाई मशीन, कैंची, इंचीटेप (नापने के लिए) और सुई-धागा।
- राजगीर / मिस्त्री (Mason): * जो ईंट, सीमेंट और बालू से हमारे घर (मकान) बनाता है।
- प्रमुख औजार: करनी (सीमेंट लगाने के लिए), साहुल (दीवार की सीध नापने के लिए), सूत और गुनिया।
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मोची (Cobbler):
- जो चमड़े से जूते-चप्पल बनाता है और उन्हें गूंथता या ठीक करता है।
- प्रमुख औजार: सुआ, रांपी और हथौड़ी।
- जुलाहा (Weaver):
- जो सूत या धागे से कपड़ा बुनने का काम करता है। (जैसे कबीरदास जी एक जुलाहे थे)। हथकरघा (Handloom) इनका मुख्य साधन है।
🔹 3. मेला (Fair) - संस्कृति का प्रतीक
मेले भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये व्यापार, धर्म और समाज के लोगों को एक साथ जोड़ने का सबसे बड़ा मंच हैं। UPTET में मेलों के स्थान सीधे तौर पर पूछे जाते हैं।
🌟 भारत के प्रमुख और प्रसिद्ध मेले (National Fairs)
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कुंभ मेला (Kumbh Mela): * यह दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। यह हर 12 साल में एक बार लगता है।
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भारत में यह केवल 4 स्थानों (नदियों के किनारे) पर लगता है:
- प्रयागराज (इलाहाबाद): गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के 'संगम' पर।
- हरिद्वार (उत्तराखंड): गंगा नदी के किनारे।
- उज्जैन (मध्य प्रदेश): क्षिप्रा नदी के किनारे।
- नासिक (महाराष्ट्र): गोदावरी नदी के किनारे।
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भारत में यह केवल 4 स्थानों (नदियों के किनारे) पर लगता है:
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पुष्कर मेला (Pushkar Mela):
- यह राजस्थान के अजमेर ज़िले (पुष्कर) में लगता है।
- यह दुनिया का सबसे बड़ा 'ऊंटों का मेला' (Camel Fair) है। यह कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगता है।
- सोनपुर मेला (Sonepur Mela):
- यह बिहार में गंगा और गंडक नदी के संगम पर लगता है।
- यह एशिया का सबसे बड़ा 'पशु मेला' (Animal Fair) है। यहाँ हाथी, घोड़े से लेकर सुई तक बिकती है। इसे 'हरिहर क्षेत्र का मेला' भी कहते हैं।
🌟 उत्तर प्रदेश के प्रमुख मेले (UP Special Fairs) - [UPTET रामबाण]
UPTET की परीक्षा दे रहे हैं, तो यूपी के मेलों को बिल्कुल रट लें:
- नौचंदी मेला: * यह मेरठ में लगता है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बहुत बड़ा प्रतीक है क्योंकि यह होली के बाद शुरू होता है और यहाँ नवचंडी देवी का मंदिर और बाले मियां की मज़ार एक साथ है।
- बटेश्वर मेला:
- यह आगरा में लगता है। यह उत्तर प्रदेश का एक बहुत प्रसिद्ध 'पशु मेला' (मुख्यतः ऊंट मेला) है।
- दादरी मेला:
- यह बलिया (उत्तर प्रदेश) में लगता है। यह भी एक बहुत बड़ा पशु मेला है जो कार्तिक पूर्णिमा को लगता है।
- माघ मेला:
- यह हर साल (कुंभ को छोड़कर) प्रयागराज (इलाहाबाद) में संगम के किनारे लगता है।
- खिचड़ी मेला:
- यह मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखपुर (गोरक्षनाथ मंदिर) में लगता है।
- देवा शरीफ मेला:
- यह बाराबंकी में हाजी वारिस अली शाह की मज़ार पर लगता है। यह भी हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का बड़ा प्रतीक है।
- शाकंभरी देवी मेला:
- यह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में लगता है।
- सैयद सालार मेला:
- यह बहराइच में लगता है।
- रामायण मेला:
- यह चित्रकूट और अयोध्या दोनों जगह लगता है।
- लठमार होली का मेला:
- यह मथुरा के बरसाना में फाल्गुन महीने में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
🔹 4. मेलों का महत्व और प्रकार
मेलों के प्रकार:
- व्यापारिक मेले: जहाँ चीज़ों की खरीद-बिक्री होती है। (जैसे- दिल्ली का प्रगति मैदान व्यापार मेला)।
- धार्मिक मेले: जो किसी विशेष धर्म या पूजा-पाठ से जुड़े हों। (जैसे- कुंभ मेला)।
- पशु मेले: जहाँ जानवरों की खरीद-बिक्री होती है। (जैसे- सोनपुर और बटेश्वर का मेला)।
मेलों का महत्व:
- इनसे हमारी संस्कृति और परंपराएं जीवित रहती हैं।
- ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Economy) को मज़बूत करते हैं। स्थानीय कारीगरों (जैसे कुम्हार, लोहार) को अपना सामान बेचने का एक बड़ा बाज़ार मिलता है।
🔹 5. UPTET विशेष: परीक्षा में छपने वाले 10 महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)
UPTET Paper 1 के लिए SK SACHIN CLASSES के ये 'रामबाण' बिंदु बिल्कुल रट लें:
- राजगीर (मिस्त्री) का औजार: साहुल और करनी होता है जो दीवार सीधी करने के काम आता है।
- कुम्हार का पहिया: इसे चाक कहते हैं जिस पर वह बर्तन का निर्माण करता है।
- एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला: सोनपुर का मेला (बिहार) है।
- उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध ऊंट/पशु मेला: बटेश्वर मेला (आगरा) है।
- हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मेला (मेरठ): नौचंदी का मेला।
- कुंभ मेला (मध्य प्रदेश): क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जैन में लगता है।
- पुष्कर मेला: राजस्थान में लगता है और ऊंटों के लिए प्रसिद्ध है।
- लठमार होली: मथुरा के बरसाना में खेली जाती है।
- देवा शरीफ का मेला: बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) में लगता है।
- लोहार का औजार: निहाई और धौंकनी होता है।
निष्कर्ष (Conclusion): हमारा परिवेश हमारे पेशों और हमारे मेलों से ही सुंदर और पूर्ण बनता है। एक शिक्षक के रूप में यह आपका कर्तव्य है कि आप कक्षा के बच्चों को उनके स्थानीय कारीगरों के श्रम का सम्मान करना सिखाएं और उन्हें भारत के विभिन्न मेलों के माध्यम से अपनी महान संस्कृति और एकता (Unity in Diversity) से परिचित कराएं।
👉अध्याय 4 के लिए यहां क्लिक करें
UPTET पर्यावरण: हमारा परिवेश व मेले
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