🌟 UPTET & CTET 2026: बाल विकास (CDP) अध्याय 12 - अधिगम (सीखना): अर्थ, प्रक्रिया और सिद्धांत (विस्तृत नोट्स) 🌟
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बाल विकास (CDP) की हमारी अध्यायवार सीरीज़ में आज हम मनोविज्ञान के सबसे बड़े, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज़्यादा अंक दिलाने वाले अध्याय पर चर्चा करेंगे— अधिगम (Learning) अर्थात सीखना।
UPTET की परीक्षा में इस अकेले चैप्टर से 4 से 5 प्रश्न पक्के तौर पर पूछे जाते हैं। एक भावी शिक्षक के रूप में आपको यह जानना ही होगा कि बच्चे सीखते कैसे हैं और मनोवैज्ञानिकों (थार्नडाइक, पावलव, स्किनर) ने सीखने के क्या नियम बताए हैं। तो चलिए, इसे बहुत ही आसान भाषा में और विस्तार से समझते हैं।
🔹 1. अधिगम का अर्थ (Meaning of Learning)
सामान्य बोलचाल में 'अधिगम' का अर्थ है 'सीखना'। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य कुछ न कुछ सीखता रहता है।
लेकिन, मनोविज्ञान की भाषा में अधिगम का एक बहुत ही सटीक अर्थ है:
"अभ्यास (Practice), प्रशिक्षण (Training) और अनुभव (Experience) के कारण व्यक्ति के व्यवहार में आने वाले स्थायी परिवर्तन (Permanent Change) को ही अधिगम कहते हैं।"
UPTET के लिए विशेष ध्यान दें:
- यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में बीमारी के कारण बदलाव आया है, तो वह अधिगम नहीं है।
- यदि थकान, शराब, नशे या किसी दवाई के कारण व्यवहार बदला है, तो उसे भी अधिगम नहीं माना जाएगा।
- अधिगम केवल वही है जो आपके अंदर 'स्थायी रूप' से ठहर जाए और जिसे आपने अभ्यास से सीखा हो।
🔹 2. अधिगम की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Important Definitions of Learning)
UPTET की परीक्षा में मनोवैज्ञानिकों के कथन सीधे तौर पर पूछे जाते हैं। इन्हें बिल्कुल रट लें:
1. जे. पी. गिलफोर्ड (J.P. Guilford) के अनुसार:
"व्यवहार के कारण व्यवहार में आया कोई भी परिवर्तन ही अधिगम है।"
2. बी. एफ. स्किनर (B.F. Skinner) के अनुसार:
"अधिगम व्यवहार में उत्तरोत्तर अनुकूलन (Progressive Adaptation) की एक प्रक्रिया है।"
3. क्रो एवं क्रो (Crow & Crow) के अनुसार:
"आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों (Attitudes) का अर्जन करना ही अधिगम है।"
4. आर. एस. वुडवर्थ (R.S. Woodworth) के अनुसार:
"नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम की प्रक्रिया कहलाती है।"
5. गेट्स (Gates) के अनुसार:
"अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में संशोधन ही अधिगम है।"
🔹 3. अधिगम की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics of Learning)
अधिगम की प्रकृति को समझने के लिए इसकी विशेषताएं जानना ज़रूरी है:
- अधिगम जीवन पर्यंत चलता है: यह जन्म से शुरू होकर मृत्यु तक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
- अधिगम उद्देश्यपूर्ण होता है: हम बिना किसी लक्ष्य या उद्देश्य के कुछ नहीं सीखते। (जैसे आप UPTET पास करने के लिए यह पढ़ रहे हैं)।
- अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है: बच्चा निष्क्रिय बैठकर नहीं सीख सकता; उसे शारीरिक और मानसिक रूप से 'सक्रिय' (Active) रहना पड़ता है।
- अधिगम सार्वभौमिक (Universal) है: दुनिया का हर प्राणी (इंसान से लेकर जानवर तक) कुछ न कुछ सीखता है।
- अधिगम स्थानांतरणीय (Transferable) है: एक परिस्थिति में सीखा गया ज्ञान दूसरी परिस्थिति में काम आ सकता है।
🔹 4. अधिगम के वक्र (Curves of Learning)
जब हम कुछ सीखते हैं, तो हमारी सीखने की गति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कभी हम बहुत तेज़ी से सीखते हैं, तो कभी बहुत धीमे।
जब सीखने की इस 'मात्रा' और 'समय/अभ्यास' को एक ग्राफ पेपर (Graph Paper) पर रेखा के माध्यम से दर्शाया जाता है, तो उसे 'अधिगम वक्र' कहते हैं। अधिगम वक्र मुख्य रूप से 4 प्रकार के होते हैं:
1. सरल रेखीय वक्र (Straight Line Curve):
- जब सीखने की गति हर दिन, हर समय बिल्कुल एक समान (बराबर) होती है।
- महत्वपूर्ण तथ्य: वास्तविक जीवन में ऐसा वक्र बनना लगभग असंभव है, क्योंकि मनुष्य मशीन नहीं है।
2. उन्नतोदर वक्र / ऋणात्मक वक्र (Convex / Negative Curve):
- इसमें शुरुआत में सीखने की गति बहुत तेज़ होती है, लेकिन समय बीतने के साथ थकान या बोरियत के कारण सीखने की गति 'धीमी' हो जाती है।
- इसे 'घटता हुआ निष्पादन वक्र' (Decreasing Return Curve) भी कहते हैं।
3. नतोदर वक्र / धनात्मक वक्र (Concave / Positive Curve):
- इसमें शुरुआत में सीखने की गति बहुत धीमी होती है (क्योंकि विषय नया होता है), लेकिन जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता है, सीखने की गति बहुत 'तेज़' हो जाती है।
- इसे 'बढ़ता हुआ निष्पादन वक्र' (Increasing Return Curve) भी कहते हैं।
4. मिश्रित वक्र / S-आकार का वक्र (S-shaped Curve):
- यह उन्नतोदर और नतोदर वक्र का मिला-जुला रूप है। इसमें सीखने की गति कभी तेज़ और कभी धीमी होती रहती है।
- महत्वपूर्ण तथ्य: मनुष्य के सीखने का वक्र सामान्यतः S-आकार का ही होता है।
🔹 5. अधिगम का पठार (Plateau of Learning)
सीखने की प्रक्रिया में एक ऐसा समय भी आता है जब हम चाहे कितना भी अभ्यास कर लें, सीखने की मात्रा में बिल्कुल भी वृद्धि नहीं होती। ग्राफ पर एक सीधी क्षैतिज रेखा (Flat line) बन जाती है।
सीखने की गति के इस पूर्णतः 'रुक जाने' को ही 'अधिगम का पठार' कहते हैं।
पठार बनने के मुख्य कारण:
- शारीरिक या मानसिक थकान का होना।
- विषय के प्रति रुचि (Interest) और प्रेरणा (Motivation) का खत्म हो जाना।
- सीखने की गलत विधि (Wrong method) का प्रयोग करना।
- शारीरिक क्षमता की अंतिम सीमा का आ जाना।
नोट: शिक्षक को बच्चों के पठार को दूर करने के लिए शिक्षण विधियों को बदलना चाहिए और बच्चों को प्रेरित करना चाहिए।
🔹 6. अधिगम का स्थानांतरण (Transfer of Learning)
"जब किसी एक परिस्थिति में सीखा गया ज्ञान, कौशल या आदत किसी दूसरी परिस्थिति में ज्ञान सीखने को प्रभावित करती है, तो उसे अधिगम का स्थानांतरण कहते हैं।"
इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं (UPTET में यहाँ से पक्का प्रश्न आता है):
1. सकारात्मक स्थानांतरण (Positive Transfer):
- जब पुराना ज्ञान नया ज्ञान सीखने में 'मदद' करता है।
- उदाहरण: साइकिल चलाने वाले व्यक्ति का स्कूटर चलाना जल्दी सीख लेना। हिंदी व्याकरण के ज्ञान से संस्कृत व्याकरण आसानी से समझ आना।
2. नकारात्मक स्थानांतरण (Negative Transfer):
- जब पुराना ज्ञान नया ज्ञान सीखने में 'बाधा' (रुकावट) डालता है।
- उदाहरण: भारत (जहाँ स्टीयरिंग दाईं ओर होता है) में गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति को अमेरिका (जहाँ स्टीयरिंग बाईं ओर होता है) में गाड़ी चलाने में बहुत समस्या होना।
3. शून्य स्थानांतरण (Zero Transfer):
- जब पुराने ज्ञान का नए ज्ञान पर कोई असर (न मदद, न बाधा) नहीं पड़ता।
- उदाहरण: कबीर के दोहे याद करने का गणित के सवाल हल करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना।
4. द्विपार्श्विक स्थानांतरण (Bilateral Transfer):
- UPTET स्पेशल: जब शरीर के एक अंग (जैसे दाएं हाथ) को दिया गया प्रशिक्षण शरीर के दूसरे अंग (बाएं हाथ) में खुद-ब-खुद ट्रांसफर हो जाए।
- उदाहरण: दाएं हाथ से लिखने वाले व्यक्ति के दाएं हाथ में चोट लगने पर, उसका बाएं हाथ से भी थोड़ा-बहुत लिख लेना।
🔹 7. अधिगम के प्रमुख सिद्धांत (Theories of Learning)
मनोविज्ञान में अधिगम के कई सिद्धांत हैं, लेकिन UPTET के लिए थार्नडाइक, पावलव, स्किनर और कोहलर सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं:
🌟 A. ई. एल. थार्नडाइक का सिद्धांत (E.L. Thorndike)
- सिद्धांत का नाम: प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत (Trial and Error Theory), उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत (S-R Theory), संबंधवाद (Connectionism)।
- प्रयोग: इन्होंने एक भूखी बिल्ली को एक भूलभुलैया वाले पिंजरे (Puzzle Box) में बंद कर दिया। बाहर उद्दीपक (Stimulus) के रूप में एक 'मृत मछली' रखी गई।
- निष्कर्ष: मछली की महक से बिल्ली ने बाहर निकलने के लिए कई गलत प्रयास (त्रुटि) किए। अचानक उसका पैर पिंजरे के लीवर पर पड़ा और दरवाज़ा खुल गया। थार्नडाइक ने कहा कि "मनुष्य भी इसी तरह बार-बार प्रयास करके और गलतियाँ करके सीखता है।"
थार्नडाइक के अधिगम के नियम (Laws of Learning):
इन्होंने अधिगम के कुल 8 नियम दिए (3 मुख्य और 5 गौण)।
मुख्य नियम (Primary Laws - Very Important):
- तत्परता का नियम (Law of Readiness): बच्चा तभी सीखेगा जब वह सीखने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार (Ready) हो। (कहावत: घोड़े को तालाब तक ले जा सकते हैं, पर पानी नहीं पिला सकते)।
- अभ्यास का नियम (Law of Exercise): अभ्यास करने से उद्दीपक और अनुक्रिया का संबंध मज़बूत होता है (उपयोग का नियम), और अभ्यास छोड़ने पर संबंध कमज़ोर हो जाता है (अनुपयोग का नियम)। (कहावत: करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान)।
- प्रभाव / परिणाम का नियम (Law of Effect): जिस काम को करने से सुख या संतोष मिलता है, प्राणी उसे बार-बार करता है। दुख मिलने पर छोड़ देता है। (इसी नियम से स्किनर का पुनर्बलन सिद्धांत निकला है)।
गौण नियम (Secondary Laws):
- बहु-अनुक्रिया का नियम (Law of Multiple Response)
- आंशिक क्रिया का नियम (Law of Partial Activity)
- मानसिक स्थिति या मनोवृत्ति का नियम (Law of Set/Attitude)
- सादृश्यता या आत्मीकरण का नियम (Law of Analogy)
- साहचर्यत्मक स्थानांतरण का नियम (Law of Associative Shifting)
🌟 B. इवान पावलव का सिद्धांत (Ivan Pavlov)
- सिद्धांत का नाम: शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत (Classical Conditioning Theory)।
- प्रयोग: एक कुत्ते (Dog) पर।
- निष्कर्ष: पावलव ने कुत्ते को भोजन (स्वाभाविक उद्दीपक - UCS) देने से कुछ सेकंड पहले 'घंटी' (अस्वाभाविक उद्दीपक - CS) बजाना शुरू किया। भोजन देखकर कुत्ते के मुँह से लार (UCR) आती थी। कई दिनों तक ऐसा करने के बाद, एक दिन पावलव ने केवल 'घंटी' बजाई (भोजन नहीं दिया), फिर भी कुत्ते के मुँह से लार (CR) टपकने लगी।
- इसे ही 'अनुबंधन' (Conditioning) कहते हैं, यानी किसी कृत्रिम चीज़ के साथ आदत का जुड़ जाना।
पावलव के सिद्धांत के महत्वपूर्ण शब्द:
- विलोपन (Extinction): यदि घंटी बजाने के बाद कई दिनों तक भोजन न दिया जाए, तो कुत्ते की लार टपकनी बंद हो जाएगी। इसे विलोपन कहते हैं।
- स्वतः पुनर्लाभ (Spontaneous Recovery): विलोपन के कई दिनों बाद यदि अचानक घंटी बजे और कुत्ता फिर से लार टपका दे, तो यह स्वतः पुनर्लाभ है।
🌟 C. बी. एफ. स्किनर का सिद्धांत (B.F. Skinner)
- सिद्धांत का नाम: क्रियाप्रसूत अनुबंधन सिद्धांत (Operant Conditioning Theory) / R-S Theory।
- प्रयोग: एक सफेद चूहे और कबूतर पर। (इनके बॉक्स को 'स्किनर बॉक्स' कहा जाता है)।
- निष्कर्ष: थार्नडाइक और पावलव में पहले उद्दीपक (खाना) दिखता था, फिर अनुक्रिया होती थी। लेकिन स्किनर ने कहा कि जीव को पहले अनुक्रिया (Response) करने दो, यदि अनुक्रिया सही है तो उसे 'पुनर्बलन' (Reinforcement) दो।
पुनर्बलन के प्रकार:
- सकारात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement): कोई अच्छी चीज़ देना जिससे काम के दोहराए जाने की संभावना बढ़े (जैसे- पुरस्कार, शाबाशी, भोजन)।
- नकारात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement): किसी बुरी चीज़ को हटा लेना जिससे काम के दोहराए जाने की संभावना बढ़े (जैसे- तेज़ धूप से बचने के लिए छाता लगाना, फेल होने के डर से पढ़ाई करना)।
- (नोट: नकारात्मक पुनर्बलन 'दंड' नहीं है। दंड से कार्य की संभावना घटती है, जबकि पुनर्बलन से बढ़ती है)।
🌟 D. कोहलर का सूझ का सिद्धांत (Wolfgang Kohler)
- सिद्धांत का नाम: अंतर्दृष्टि या सूझ का सिद्धांत (Insight Theory)।
- प्रयोग: चिंपैंजी (वनमानुष) पर। इनके सबसे प्रसिद्ध चिंपैंजी का नाम 'सुल्तान' था।
- निष्कर्ष: कोहलर 'गेस्टाल्टवादी' (Gestalt) संप्रदाय के थे। गेस्टाल्ट का अर्थ है 'समग्र रूप' (As a whole)। कोहलर ने कहा कि हम बार-बार गलती करके नहीं सीखते, बल्कि अपनी 'बुद्धि' का प्रयोग करके सीखते हैं। जब हम समस्या को पूरी तरह से देखते हैं, तो दिमाग में अचानक (Suddenly) एक 'सूझ' आती है और समस्या हल हो जाती है।
🌟 E. अल्बर्ट बंडूरा का सिद्धांत (Albert Bandura)
- सिद्धांत का नाम: सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)।
- प्रयोग: एक बोबो डॉल (Bobo Doll) और जीवित जोकर पर।
- निष्कर्ष: बंडूरा का मानना था कि बच्चे दूसरों के व्यवहार को 'देखकर' (Observation) और उनकी 'नकल' (Modeling) करके सीखते हैं। बच्चे टीवी या समाज में जो देखते हैं (आक्रामक या शांतिपूर्ण व्यवहार), वही सीख लेते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion): एक सफल शिक्षक वही है जो अपनी कक्षा में इन सभी सिद्धांतों का मिश्रण प्रयोग करे। छोटे बच्चों को थार्नडाइक के 'अभ्यास' नियम से सिखाया जा सकता है, जबकि बड़े बच्चों में कोहलर की 'सूझ' (बुद्धि) विकसित करना आवश्यक है। अधिगम कोई रटने वाली चीज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन को बेहतर बनाने की एक निरंतर यात्रा है।
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